Saturday, October 3, 2009

कविता

भाव को संजोए वह
शब्द से लिपट गयी
कहीं छन्द सी खनकती
प्रकृति के निकट गयी
कभी शरमाई
मन घूँघट से ताकती
कभी सबकी
पीड़ा के अंतर में झाँकती
कभी सकुचाई
सम-सामयिक को बांचती
चिंतन के चितवन से
देखती समाज को
तोड़ छन्द - बँध
काव्य रीति के अनुबंध
धर्म-जाति , राज - काज
राग द्वेष , कल और आज
सब पर हो कर निशंक
आधुनिका सी विचारों को बांचती
मुझमें सामर्थ्य कहाँ
मैं जो करूँ उसकी सृष्टि
शारदे की दया दृष्टि
शब्दों प्रचुर वृष्टि
और भावना की संतुष्टि
जब-जब हो जाती है
कविता बन जाती है !
कविता बन जाती है !

14 comments:

महेन्द्र मिश्र said...

भावपूर्ण रचना . धन्यवाद

महफूज़ अली said...

behad bhaavpoorna rachna.......

जब-जब हो जाती है
कविता बन जाती है !
कविता बन जाती है

bilkul sahi.....

रश्मि प्रभा... said...

aur phir hum tak pahunch jati hai......bahut sundar

Mithilesh dubey said...

बहुत ही उम्दा व सुन्दर रचना।

shama said...

Kitnee niragasta hai is rachname!

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://kavitasbyshama.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelypath.blogspot.com

anubhooti said...

मॉ शारदे का आशीर्वाद बना रहे, और हम सभी को सुन्दर रचनाए पढ्ने को मिलती रहे.

HARI SHARMA said...

ज्योत्स्ना जी की ये कविता एक तरह से उनके पूरे व्यक्तित्व और रचना प्रक्रिया का दिग्दर्शन कराती है.

nivi_2212 said...

अतिउत्तम शब्द रचना........
शुभकामनाएं सखी.......
आदि से अंत तक,अंग-प्रत्यंग कविता का मनोहार बांचा आपने....

KBK ENTERPRISES said...

साड़ी की साड़ी पंक्तियाँ सुन्दर और भावपूर्ण शब्दों से रचित है,

हिमांशु । Himanshu said...

"मैं जो करूँ उसकी सृष्टि
शारदे की दया दृष्टि
शब्दों प्रचुर वृष्टि
और भावना की संतुष्टि
जब-जब हो जाती है
कविता बन जाती है !
कविता बन जाती है !"

अदभुत है । आपकी काव्य-सामर्थ्य उत्फुल्ल करती है । आभार ।

Rakesh said...

भाव को संजोए वह
शब्द से लिपट गयी
कहीं छन्द सी खनकती
प्रकृति के निकट गयी
कभी शरमाई
मन घूँघट से ताकती
कभी सबकी
पीड़ा के अंतर में झाँकती
कभी सकुचाई
सम-सामयिक को बांचती
चिंतन के चितवन से
देखती समाज को
तोड़ छन्द - बँध
jyotsna
bahut hi achi dharapravah kavya shamta se bherpur ye kavita ..ukt panktiyon mein apne saroch per hai ..eski jitni taarif ki jaye kum hai...bahut acha laga aapki kavita v bhav padhker ..badhai

shyam1950 said...

sundar rachna aur iski rachnaprkriya

sa said...

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aa said...

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