Wednesday, June 30, 2010

चिर-प्रतीक्षा

कब तक अवगुंठित रहूँ
जीवन या जीवन-क्षरण में?
मैंने तो न देर की प्रिय!
आपके शुभ संवरण में......

प्रेम वर्षा से प्रिय तुम
आज अंतस सिक्त कर दो,
संग रहना तुम सदा ही
प्रेम के इस आचरण में.......

मैंने तो न देर की प्रिय!
आपके शुभ संवरण में.....

रात्रि की निस्तब्धता में
तार मन के जुड गए
लौ लगी तुमसे रही प्रिय!
आत्म के निज जागरण में.......

मैंने तो न देर की प्रिय!
आपके शुभ संवरण में......

शून्य की अनुभूति पाऊँ
इतना तुम स्वछन्द कर दो,
हूँ चिर प्रतीक्षारत युगों से
देह के इस आवरण में........

मैंने तो न देर की प्रिय!
आपके शुभ संवरण में........

तेरा अलौकिक रूप देखूं
बंद आँखों से मनोहर
करबद्ध हूँ अब ले चलो
सानिध्य के वातावरण में........

मैंने तो न देर की प्रिय!
आपके शुभ संवरण में........

44 comments:

Deepak Shukla said...

Hi...

Sundar bhavnatmak kavita, vishudhdh Jyotsna ji ki shaili main...

Deepak...

राजेश उत्‍साही said...

बहुत मनभावन आग्रह है प्रिय के लिए। ऐसे स्‍नेहयुक्‍त आग्रह के बाद प्रिय कैसे रुक सकते हैं। वे तो आते ही होंगे। शुभकामनाएं।

sanu shukla said...

उम्दा रचना...!!

मुकेश कुमार सिन्हा said...

श्रृंगार रस से भरपूर मनभावन रचना........:)

निमंत्रण: हमरे ब्लॉग पे आने का.........:P

Udan Tashtari said...

बेहतरीन उत्कृष्ट भावपूर्ण रचना!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.....भावना प्रधान कविता....


संवरण ..........शब्द का अर्थ ?..

अकसर मैंने इसको रोकने के रूप में ही सुना है...

जैसे लोभ संवरण नहीं कर पाना ....
इस लिए जानना चाहती हूँ कि यहाँ किस अर्थ में प्रयोग किया गया है .

डाॅ रामजी गिरि said...

प्रेम और आराधना के बीच के दूरी मिटाती है आपकी रचना..

राजकुमार सोनी said...

इस तरह की शानदार भाषा के साथ अब गीत कहां पढ़ने को मिलते हैं।
कई पुराने गीतकार याद आ गए।
अच्छा लगा।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

उम्दा रचना
शुभकामनाएं

आपके ब्लाग की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर

सूर्यकान्त गुप्ता said...

सुन्दर अभिव्यक्ति!

ज्योत्स्ना पाण्डेय said...

संगीता जी,
आपका कथन बिलकुल सही है कि "संवरण" का अर्थ -----
"मनोवेग आदि को दबा या रोककर वश में रखना। नियंत्रण से बाहर न होने देना। निग्रह। जैसे—क्रोध या लोभ का संवरण करना। "
किन्तु मेरे द्वारा इसका प्रयोग ----------
" कन्या का विवाह के लिए अपना पति या वर चुनना।" इस अर्थ के साथ किया गया है ....

आपने मेरी रचना को इतने ध्यान से पढ़ा | धन्यवाद |

रश्मि प्रभा... said...

priya ko samarpit bhawnayen bahut achhi lagi

36solutions said...

बेहतरीन रचना, कविता के मूल भावों में बहते सटीक शव्‍दों का प्रयोग. शब्‍द कठिन होते हुए भी उनके अर्थ सरल व अनुभूति में डुबोते हुए हैं.

धन्‍यवाद.

36solutions said...
This comment has been removed by the author.
राजेश उत्‍साही said...

ज्‍योत्‍सना जी आपने संवरण को बिलकुल सही अर्थ में प्रयुक्‍त किया है। उसका अर्थ है चयन।

डॉ. जेन्नी शबनम said...

jyotsna ji,
araadhya dev ke prati prem ki komal aur manbhaawan abhivyakti. bahut sundar rachna, badhai sweekaren.

Vivek Jain said...

वाह, वाकई शानदार
vivj2000.blogspot.com

girish pankaj said...

sundar geet....man ko choo lene vala. subhkamanaa isi tarah ke achchhe lekhan ke liye.

स्वाति said...

रात्रि की निस्तब्धता में
तार मन के जुड गए
लौ लगी तुमसे रही प्रिय!
आत्म के निज जागरण में.......
wah wah .. kya baat hai..

Anonymous said...

गेयता से परिपूर्ण उत्तम रचना - बधाई

अरुणेश मिश्र said...

देर तो मैने न की प्रिय !
आपके शुभ संवरण मे ।
प्रशंसनीय ।

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

इश्के हकीकी की शुरूआत सी लगती है यह प्रतीक्षा।
................
अपने ब्लॉग पर 8-10 विजि़टर्स हमेशा ऑनलाइन पाएँ।

Harshvardhan said...

sudar bhaav ......

Harshvardhan said...

sudar bhaav ......

Unknown said...

संवरण का अर्थ निग्रह, आवरण और आच्छादन भी होता है। निग्रह या लोभ पर आवरण डालना उसे रोकने-दबाने का ही बोध कराता है। बहाना, छद्मवेश, बहाना करना, घेरा, बन्द करना, गुप्त भेद, बांध, चुनना, पसंद करना, पति चुनना आदि भी संवरण के अन्य अर्थ हैं। ढक्कन, समझ, संपीडन, संयम, अनुभूति, संकोचन, सेतु, पुल, बांध, एक प्रकार का हरिण, जल, बौद्धों का एक अनुष्ठान, सहनशीलता, आत्म नियंत्रण, कर्मों का प्रवाह रोकना, बाह्य जगत को अपने से अलग रखना के अर्थ में संवर शब्द काम लेते हैं। संवर या शंबर एक राक्षस का नाम है। जिसमें रोकने की शक्ति हो उसे संवरणशील कहते हैं। दिन का हिसाब करते समय बची हुई रकम यानी रोकड़ बाकी को संवरण शेष और दिन के बचे माल को संवरण स्कन्ध कहा जाता है। छिपाने- ढकने योग्य, गुप्त रखने योग्य, विवाह के लिए वरण करने योग्य को संवरणीय कहते हैं। अपने लिए (छीन झपटकर) बटोरना, भक्षण करना, गुणन या गुणनफल के अर्थ में संवर्ग शब्द काम लेते हैं।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

ज्योत्सना जी,

आपके स्पष्टीकरण के लिए आभार...

@ राजेश जी ,
आपका भी आभार..

@@ आवेश,
इतने विस्तार से बताने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंगलवार 06 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

ZEAL said...

shunya ki anubhuti paun, itna tum swachhanda kar do...


waah! kya baat keh di...

sundar rachna

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

हूँ चिर प्रतीक्षारत युगों से
देह के इस आवरण में

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ... उत्तम रचना ! बहुत अच्छा लगा पढ़कर ...

नीरज गोस्वामी said...

अनुपम रचना...बधाई...
नीरज

Parul kanani said...

beautiful feelings!

दिगम्बर नासवा said...

शून्य की अनुभूति पाऊँ
इतना तुम स्वछन्द कर दो,
हूँ चिर प्रतीक्षारत युगों से
देह के इस आवरण में.......
श्रांगार की बूँदें भिगो रही हैं अंतस तक इस मन को ...

kumar zahid said...

कब तक अवगुंठित रहूँ
जीवन या जीवन-क्षरण में?
मैंने तो न देर की प्रिय!
आपके शुभ संवरण में......

रात्रि की निस्तब्धता में
तार मन के जुड गए
लौ लगी तुमसे रही प्रिय!
आत्म के निज जागरण में.......

शून्य की अनुभूति पाऊँ
इतना तुम स्वछन्द कर दो,
हूँ चिर प्रतीक्षारत युगों से
देह के इस आवरण में........

तेरा अलौकिक रूप देखूं
बंद आँखों से मनोहर
करबद्ध हूँ अब ले चलो
सानिध्य के वातावरण में........

jYASNA G ,

aapki shbd sadhna stutya hai...matra ka jitna sundar kale aur niyantran aapne kiya hai wah kam dekhne milta hai..
Ullekhneeya hai aapka vichhar par adhikar aapki bhavnatmak gati mein kahi yati nahi hai---nirantarta hai, pranay ka dharasvar prawah hai...

Aanewale dinopn mein hindi lipi mein tippaniyan kar sakoonga eisi aashaa hai, yadi aap approce karne mein khushi mahsoos kar sakein to...

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

ज्योत्सना जी बहुत दिनों के बाद कोई शानदार श्रृंगारिक रचना पढने को मिली। सचमुच मन प्रसन्न हो गया।
--------
पॉल बाबा की जादुई शक्ति के राज़।
सावधान, आपकी प्रोफाइल आपके कमेंट्स खा रही है।

Harshvardhan said...

achchi rachna likhi hai..... nice...

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.....भावना प्रधान कविता....

शोभना चौरे said...

bahut sundar geet

Pushpendra Singh "Pushp" said...

wah.........sundar rachna

V.P. Singh Rajput said...

बहुत सुन्दर!!

पूनम श्रीवास्तव said...

bahut hi vinaypurn agrah bhala priy ise kaise thukra sakte hain.
poonam

vijay kumar sappatti said...

WAAH WAAH

KYA KHOOB , YE RACHNA , SIRF APNE PREMI KE LIYE HI NAHI APITU BHAGWAAN KE LIYE BHI HAI ,,.. MUJHE TO PADHTE HUE AISA HI LAGA.....

AAPKO BADHAI.

VIJAY
आपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html

SATYA said...

bahut sundar rachna,
कृपया अपने बहुमूल्य सुझावों और टिप्पणियों से हमारा मार्गदर्शन करें:-
अकेला या अकेली

Akanksha Yadav said...

बहुत सुन्दर कविता लिखी आपने.... खूबसूरत अभिव्यक्ति.

श्री कृष्ण-जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें

ramji said...

मन बोल उठा सुनकर पुकार
कवि ऋणी नहीं अपवादों का
जो करते हर फन में सुराग
मन ब्यथित हुआ अंतर स्वर से
बह गए अश्रु बन शब्द राग
काली गहराती रातों में जब
निद्रा ने आगोश भरा , बिरहिन की सूनी सेजों पे
जब अंगारों ने नृत्य किया , बिरहिन के आंशू बरस परे ,
तब कवि जी ने निज कविता से भावों की मधुर बरसात किया
उस एकाकी सूनी रैना में बरसा ,कविता से रस दुलार ........

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