Sunday, November 8, 2009

सिलसिले चाहतों के गाने लगे

आज फिर याद तुम मुझको आने लगे
सिलसिले चाहतों के गाने लगे ........

मोहब्बतों के चिराग जलाये बहुत
आँधियाँ बन अपने बुझाने लगे...

तेरी राहों में दिल को बिछाए रहे
राह-ए-दिल पर तुम लड़खडाने लगे..

मैं तो रूठी रही थी यही सोचकर
कोई आये, आकर मनाने लगे....

चाँद पर था मिलने का वादा सनम
क्यों अमावस में मुंह अब छिपाने लगे..

सहर तक सभी राज़ जल जायेंगे
हम चिरागों को सबकुछ बताने लगे..

तुम कहते हो शबनम गिरी रात भर
अश्क-ए-चाँदनी यूँ झिलमिलाने लगे..

Monday, October 12, 2009

"दिवास्वप्न"

बहुत ज़रूरी है,
जीवन में वह
सांसों की तरह---

मैं उसे अंतर तक समा लेती हूँ,
सांसों की ही तरह,
पर उसे,
मेरे अंतर में सिमटने से,
घुटन होती है----

वह आकाश की ऊंचाइयों को
छूना चाहता है,
पक्षियों-सा
उड़ना चाहता है,

पर्वतों पर
उछलना चाहता है,
तितलियों के रंग ,
मुट्ठी में भरना चाहता है-----

आवारा जंगलों में ,
घूमना चाहता है,
हर पत्ते पर
अपना नाम लिखना चाहता है,
समुद्र की गहराइयों को
नापना चाहता है----

झीलों में जलतरंग का
संगीत भरना चाहता है,
चांद पर टहलना चाहता है,
चाँदनी से बतियाना चाहता है----

अब वह उन्मुक्त है,
मेरा अपनत्व उसे बांधता नहीं,
मैं खुश हूँ यह सोचकर---

यदि वह मेरा है तो,
लौटकर आएगा, मेरे पास ,
यदि नहीं आया वह तो,
"वो"खुली आँखों से,
दिन में देखा गया,
एक सुन्दर दिवास्वप्न था

Saturday, October 3, 2009

कविता

भाव को संजोए वह
शब्द से लिपट गयी
कहीं छन्द सी खनकती
प्रकृति के निकट गयी
कभी शरमाई
मन घूँघट से ताकती
कभी सबकी
पीड़ा के अंतर में झाँकती
कभी सकुचाई
सम-सामयिक को बांचती
चिंतन के चितवन से
देखती समाज को
तोड़ छन्द - बँध
काव्य रीति के अनुबंध
धर्म-जाति , राज - काज
राग द्वेष , कल और आज
सब पर हो कर निशंक
आधुनिका सी विचारों को बांचती
मुझमें सामर्थ्य कहाँ
मैं जो करूँ उसकी सृष्टि
शारदे की दया दृष्टि
शब्दों प्रचुर वृष्टि
और भावना की संतुष्टि
जब-जब हो जाती है
कविता बन जाती है !
कविता बन जाती है !

Friday, September 25, 2009

शराबी आँखों ने......

गुलाबी रंग क्यों घोला शराबी आँखों ने
बहुत रोये हो ये बोला शराबी आँखों ने

उसके देखने में आग जाने थी कैसी ?
चाँदनी को किया शोला शराबी आँखों ने

तुम्हीं कहते थे कि मुझसे कोई रिश्ता नहीं
उतार फेंका ये चोला शराबी आँखों ने

लबों पर तेरे तबस्सुम क्यों रोती रही
कब राज़ ये खोला शराबी आँखों ने?

"चाँदनी" भी रोती रही थी शब् भर
इश्क को जिस्म से तोला शराबी आँखों ने

Thursday, September 3, 2009

तुम्हारे लिए..........





पंक में थी, तूने कमल कर दिया
जीवन को मेरे ग़ज़ल कर दिया

खट्टे-मीठे जीवन की अनुभूति तुम
साथ ने तेरे मुझको सबल कर दिया

तेरे प्यार से घर यूं सुवासित रहा
झोपडी को जैसे महल कर दिया

प्रश्न-बाणों से जीवन बिंधा था मेरा
सभी को सहजता से हल कर दिया

जन्म-दिन पर तेरे दूं उपहार क्या ?
अर्पण अपना तुझे आज-कल कर दिया

तेरा स्नेह पाकर हुयी धन्य मैं
"चांदनी" को तूने विह्वल कर दिया ।


नोट:- मेरे जीवन-साथी "श्री नाम देव पाण्डेय " के जन्म-दिवस (३सितम्बर) पर आप सभी सुधी पाठकों से उनकी दीर्घायु के लिए मंगल कामनाओं की आकांक्षी हूँ॥
धन्यवाद् .

Saturday, August 29, 2009

कुछ मीठा हो जाए

उसने कहा--
'आज शाम कुछ मीठा हो जाए'

"कुछ मीठा हो जाए" का मतलब ये बिलकुल नहीं कि-
रंगीन रैपर में लिपटे
चाकलेट उसे पसंद हैं---

मिठाइयाँ----?
नहीं-नहीं!!
चालीस के दशक में,
मिठाइयां उसकी सेहत के लिए ठीक नहीं........
ख़ुदा उसे सेहत बख्शे, उम्रदराज़ करें----

वो सड़कछाप मजनूँ भी नहीं कि
अपने गलत लफ्जों को
"मीठा" कि चाशनी में लपेटे,
और मुझ पर फेंके ----

मेरा आशिक भी नहीं जो
शाम ढले,
कुछ मीठे अहसासों में
गुम होने कि बात करता हो----

शायद! दुनिया में दर्द ज्यादा हैं,
और उसमें सहने का साहस कम
दूसरों के आँसुओं का खारापन
उसे विवश कर देता है॰
वह कह उठता है ---
"आज शाम कुछ मीठा हो जाए"

वो मेरी और आपकी तरह,
कविता में जीता है...
सोचती हूँ, आज शाम
उसे एक मीठी-सी नज़्म परोस दूँ!!

Monday, July 27, 2009

चाँदनी हूँ

चाँद से मिलकर मैं निखर जाऊंगी
चाँदनी हूँ छत पर उतर जाऊंगी ......

सोचा न था लफ्जों में उतर सकती हूँ
एक दिन तेरी ग़ज़लों में भर जाऊंगी.....
(साभार-- मासूम शायर)

खाते हो झूठी क़समें भला क्यों
क्या करोगे कभी जो गुज़र जाऊंगी......

दूर तुमसे रहूँ भी तो कैसे सनम?
अब तुम्हें छोड़ कर मैं किधर जाऊंगी ......

तुमसे मिलने से पहले थी बेजार मैं
तुम मिले हो अब मैं संवर जाऊंगी........

तेरे ख्यालों से अब जी भरता नहीं
तुम संभालो नहीं तो बिखर जाऊंगी ......

चाँदनी ने कहानी लिखी दर्द की
चाँद के बिना मैं तो मर जाऊंगी.... ...

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