आज फिर याद तुम मुझको आने लगे
सिलसिले चाहतों के गाने लगे ........
मोहब्बतों के चिराग जलाये बहुत
आँधियाँ बन अपने बुझाने लगे...
तेरी राहों में दिल को बिछाए रहे
राह-ए-दिल पर तुम लड़खडाने लगे..
मैं तो रूठी रही थी यही सोचकर
कोई आये, आकर मनाने लगे....
चाँद पर था मिलने का वादा सनम
क्यों अमावस में मुंह अब छिपाने लगे..
सहर तक सभी राज़ जल जायेंगे
हम चिरागों को सबकुछ बताने लगे..
तुम कहते हो शबनम गिरी रात भर
अश्क-ए-चाँदनी यूँ झिलमिलाने लगे..
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