Saturday, March 21, 2009

नारी बनाम वृक्ष

नहीं जानती क्या अच्छा है, क्या बुरा
और उसे जानने से पहले
अपने को जानना चाहा
तो पाया----

मैं हड्डियों की शाखों पर
मांसल फलों से भरा
एक वृक्ष हूँ

जिसे माली ने बहुत ही प्यार से
वात्सल्य के अवलम्ब से,
ममता के पोषण से,
फटकार की धूप से,
प्रेरणा के जल से सिंचित किया है----

जिसके स्नेहिल करों का
कोमल स्पर्श
शीतल वायु का आभास देता है,
सोचती हूँ मेरा माली
कितने दुलार और जतन से सेता है----

अपने को और अधिक जान पाती
विचारों में और गहरे तक जाती
इससे पहले ही,
एक चीख से ध्यान टूटा
मन और एकाग्रता का साथ छूटा----

अचानक मुझे मेरे जैसे
अगणित वृक्ष दीखने लगे
कोई हंसने कोई रोने,
तो कोई चीखने लगे

हर एक की अपनी व्यथा है
मांसल फलों से भरा होना ही
कुछ की तो सज़ा है
फलों का रस चूस कर
वृक्ष से
ठूंठ बनाने वाले
ऊंचे मंचों से बोलते नज़र आते हैं
"नारी सर्वत्र पूज्यन्ते"
का नारा लगते हैं----

कभी-कभी तो लोग
अपनी मुठ्ठियों को गर्म करने के लिए
इन्हें जलाते हैं
अपने घरों में
भौतिकता-परक सज्जा हेतु
इनसे सहयोग की अपेक्षा में
इनको ठोंकते पीटते काटते हैं!
अपने से जोड़े रखने के लिए
हमदर्दी का 'फेविकोल' लगाते हैं
ऊपर से पॉलिश लगाकर इन्हें चमकाते हैं
या यूं कहिये----
इनका 'फेशियल' करवाते हैं

इनकी चीखों का शोर
और जलने की सड़ांध से फैलता प्रदूषण
हमारे समाज को बीमार कर रहा है
और समाज क्या कर रहा है?
सोचती हूँ----
"समाज में रहने वाला व्यक्ति
समाज से अलग
अपने को कैसे सोच सकता है?
स्वयं को कैसे बांच सकता है?

27 comments:

अनिल कुमार वर्मा said...

कविता के माध्यम से नारी का सटीक चित्रण...उसकी व्यथा को भी बाखूबी शब्द दिए हैं...ज्योतस्ना जी, हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि आसानी से बदलते नहीं दिखते...

નીતા કોટેચા said...

जैसे मेरे ह्रदय की चीख आप सुनती हो..और अपने शब्दों में ढालती हो...क्या लिखु इस पे..सब तो आ गया इसमें...

MANVINDER BHIMBER said...

jo hamne dasta apni sunaae aap kyo roye
tabaahi to hamare dil pe aaee aap kyo roye

अखिलेश शुक्ल said...

माननीय महोदय
सादर अभिवादन
आज मैंने आपके ब्लाग पर भ्रमण किया। आपकी रचनाशीलता के लिए
बधाई स्वीकारें। रचनाओं के प्रकशन के लिए साहित्यिक पत्रिकाओं के पते चाहते हों तो मेरे ब्लाग पर अवश्य ही पधारें।
अखिलेश शुक्ल
संपादक कथा चक्र
http://katha-chakra.blogspot.com

प्रेम सागर सिंह [Prem Sagar Singh] said...

salute to NARI VRIKSHA. please delete word verification.

mehek said...

ek sashakta rachana ke liye badhai,nari vruksh ka mann bhav aj shabdon mein bayan hua.

संत शर्मा said...

Nari ki vyatha ka kushalta purvak chitran kiya hai aapne, Achchi kavita.

AAKASH RAJ said...

ज्योत्स्ना जी, आपने नारी की व्यथा का बहुत ही अच्छा चित्रण किया है |

ND Pandey's Blog said...

ज्योत्स्ना की ये पंक्तिया सामाजिक प्रदूषण की भयावहता का अहसास दिलाती हैं .आज समाज को आवश्यकता है इसे दूर करने की, क्यों न हम सभी प्रण करें..
और समाज के उन ठेकेदारों को सचेत करें कि नारी एक फलदार वृक्ष नहीं हैं जिसका शोषण
मनमाने ढंग से किया जाता रहेगा... और सारा समाज केवल देखता रहेगा...

masoomshayer said...

उस बार भी आप की रचना दिल और दिमाग दोनों जगह पहुँची लिखने के लिए शुक्रिया
लिखती राहें इस के लिए शुभकामनाएं

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" said...

ज्योत्स्ना...
अभिवंदन

कुछ अन्तराल से ही सही, लेकिन आपकी बहुत ही खूबसूरत रचना पाठकों के समक्ष आई है.
चर और अचर दोनों में जीवन्तता होती है. जन्म- विकास- फूलना-फलना- और अंत होना भी सामान है.
नारी और वृक्ष में सबसे बड़ी समानता ये है की दोनों ही समर्पित भाव से परोपकार में ही अपना जीवन लगा देते हैं. दोनों को ही स्नेह से पाला और बड़ा किया जाता है. लेकिन आज भी दोनों
को वो सम्मान और संरक्षण प्राप्त नहीं है जिसके ये अधिकारी हैं. चन्द स्वार्थ और नासमझी के चलते कुछ लोगों को ज्ञात नहीं है कि ये कितना बड़ा सामाजिक अहित कर रहे हैं.
आप ने सच ही लिखा है कि

" समाज में रहने वाला व्यक्ति
समाज से अलग
अपने को कैसे सोच सकता है?
स्वयं को कैसे बाँच सकता है? "

ये वास्तव में एक कटु और सत्य अभिव्यक्ति है कि समाज में रहने वाला ही उसी डाल को काट रहा है जिस पर बैठा हुआ है.
बहुत ही अच्छे सलीके से प्रांजलित रचना " नारी बनाम वृक्ष " आपकी श्रेष्ठ चिंतन का ही प्रतिफल है.
कुछ पंक्तियों को मन ने बार बार पढना चाहा ----

"मैं हड्डियों की शाखों पर
मांसल फलों से भरा
एक वृक्ष हूँ"

"इनकी चीखों का शोर
और जलने की सड़ांध से फैलता प्रदूषण
हमारे समाज को बीमार कर रहा है "
- विजय

रश्मि प्रभा said...

विस्मयविमुग्ध हूँ......बड़ी बारीकी से नारी का चित्रण किया है,उसकी ज़िन्दगी के हर पहलू को सजीव बना दिया है,जितनी प्रशंसा करूँ कम है.......

Beautiful Nature said...

bahut sunder vyang

awesh said...

अच्छी रचना ,आपकी कविताओं की नारी हमेशा चोटिल .भयभीत,और पुरुष के आगे बेबस क्यूँ रहती है ?कभी हमने उसे संघर्ष करते हुए खुद की सत्ता को स्थापित करते नहीं देखा ,समाज सिर्फ पुरुषों से नहीं बनता ,फिर क्यूँ स्त्री चुप है प्रदुषण के खिलाफ ?आशा है अगली बार आपकी कविता को हंसते और नंग पाँव चलते देखूंगा

Santhosh said...

Hi, it is nice to go through ur blog...well written..by the way which typing tool are you suing for typing in Hindi..?

i understand that, now a days typing in an Indian language is not a big task... recently, i was searching for the user friendly Indian language typing tool and found.. " quillpad". do u use the same..?

Heard that it is much more superior than the Google's indic transliteration...!?

expressing our views in our own mother tongue is a great feeling...and it is our duty too...so, save,protect,popularize and communicate in our own mother tongue...

try this, www.quillpad.in
Jai..Ho...

BrijmohanShrivastava said...

रचना का आठवां पद ""कभी कभी तो ......करवाते है "" इनमे वो ठूंठ भी शामिल ;हैं जो कभी फलदार ब्रक्ष थे

श्यामल सुमन said...

नारी के प्रति वर्तमान प्रदूषित स्थिति का सही चित्रण। वाह।

सेविंग ब्लेड से लेकर ट्रेक्टर के टायर तक,
नारी देह का खुला प्रदर्शन होता है।
"यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते" का प्राचीन सिद्धान्त,
अपने आप पे रोता है।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsoman@gmail.com

आकांक्षा~Akanksha said...

Bahut sundar likha..badhai
___________________________
नव संवत्सर २०६६ विक्रमी और नवरात्र पर्व की हार्दिक शुभकामनायें

ρяєєтι said...

क्या कहे इस रचना पर हम ...,
हम तो नी:शब्द हुए ... कहते है मौन की भाषा बहूत मायने रखती है .. बस पढ़ सको तो पढ़लो ...

हम जीजू की बात से सहमत है "कि नारी एक फलदार वृक्ष नहीं हैं जिसका शोषण
मनमाने ढंग से किया जाता रहेगा... और सारा समाज केवल देखता रहेगा..."

Abhishek Mishra said...

Saargarbhit kavita. Badhai.

दर्पण साह 'दर्शन' said...

Sahi aur satik....
Maza aa gaya ape muktak main...

A N JHA said...

Achha hai,bahut achha.Ek rachanakaar ke roop me aapne apani abhibyakti me un vichharon ko kalatmak sampreshan diya hai jo aaj "gender issue"se sambandhit mane jate hain.Stri-puroosh sambandh aur nar-nari samaanta haamare samaaj,dharma aur rajnitik chintan ke kendra meraha hai.Ramdhari singh "Dinkar"ki Urvashi ya Jainendr ki Sunitra bhi to isi dvandva ki abhivyakti hai.Agyeya ke Nadi ke Dveep me bhi to idi dvadva ko darshaya gaya hai.Kahane ka arth aap samajh gaye honge--yah to shashwat yaksha prashna hai.Naiti-Naiti---is prashna ka koi uttar ho hi nahi sakta kyonki HADDIYON KI SAKH PAR MANSAL PHAL HONA kise nahi achha lagta?Swyam lekhak ko bhi yah mansalta bahut priya prateet hota hai.Han mansalta jab roodan ka karak ban jaye to chinta ki baat hai,wah bhi isliye ki ham us mool sthiti se itna door bhatak chooke hain ki ham khud se hi sansay karne lagate hai.atah aao is sansay bhae baadlo ke piche chhipe hue prabhapoorna jyotirmay rashmi kiran ka swagat karo.Samvedna se bhi pare jaakar vivcharo ko mathane hetu prerit karane ke liye shukriya.

प्रदीप मानोरिया said...

नारे के अंतर्मन को और उसकी परिस्तिथि को उकेरती आपकी यह रचना बहुत सुन्दर है , वास्तव में नारी के समस्त पहलूओं को आप बेहद सटीक च्तिरित करती हैं
विगत एक माह से ब्लॉग जगत से अपनी अनुपस्तिथि के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ

R.B.Chaturvedi said...

Ati sunder ati uttam.

Mai Aur Mera Saya said...

tarif nahi karunga .. mahsus kar raha hu .. dil me dard utha hai ..

satish kundan said...

बहुत ही मार्मिक रचना जो मन को बार -बार झकझोरती है ...क्या सच में नारी की बस इतनी ही उपयोगिता है??????????

sa said...

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