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Sunday, May 9, 2010

माँ!

सूरज के जागने से पहले जागती


चिड़ियों के चहकने से पहले,



आँगन बुहारती



मुझे नींद से जगाने के लिए



दुलराती



अपने पद चिह्नों पर



चलने को प्रेरित करती



मर्यादा और संस्कार कि धरोहर समेटे



आदर और स्नेह कि सीख देती



मैंने,



उसे कर्तव्यों का निर्वहन करते भी देखा है--



अपने अधिकारों को भी पाना



उसका अधिकार नहीं था



तथाकथित बड़ों के तानों और उलाहनों का दर्द



आँखों तक आने से पहले ही



कहीं अन्दर समेट लेती



पूछने पर होठों पर



मौन की सांकल लगा लेती



जब वही बड़े लोग



मुझे लड़की होने के कारण



दुत्कारते



वह भूल जाती



माँ-मर्यादा, संस्कार



कर्त्तव्य और स्नेह!



मैंने उसे



मेरे अधिकारों के लिए



लड़ते भी देखा है



वह कोई और नहीं



मेरी माँ है!

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