गतांक की याद दिलाने के लिए पुनः कुछ पंक्तियाँ दीदी की उसी रचना से......
आज की भागमभाग में
इसी की ज़रूरत है !
तुम एक सपना लो-और मेरे पास एक मुस्कान दे जाओ,
.......इनसे ही मेरे घर का चूल्हा जलता है!
जब भी मैं इन कविताओं को पढ़ती हूँ, वे मेरा हौंसला बढाती हैं मैं फिर नई आशा से भर जाती हूँ. दीदी का स्नेह और आशीष पाने के लिए, मैं उनसे प्रायः प्रतिदिन ही बतें करती हूँ.कौन जाने कब उनके आशावाद की कुछ छींटे मुझ पर गिर जायें और मैं निराशा से दूर एक सहज, सरल, एवं निश्छल हँसी देकर उनकी पोटली से एक सपना चुरा लूँ. मुझे वो अपना सपना भी देने को कहती हैं और हँसी भी. एक निस्वार्थ भावना और ढेर सारा अपनापन, यही तो उन्हें औरों से अलग कर देता है. जब भी मैं उनसे बातें करती हूँ, वे अपनेपन के साथ मुझे अपनी कविता के माध्यम से उत्तर देती हैं----
तुमने मुझे 'अच्छी' कहा
तो घटाएं मेरे पास आकर बैठ गयीं,
मेरी सिसकियों को अपने जेहन में भर लिया.....
सारी रात घटाएं रोती रहीं,
लोग कहते हैं -' अच्छी बारिश हुई '
पीड़ा से भीगा उनका मन प्यार को पूजा समझता है. वे कहती हैं प्यार स्त्री और पुरूष के बीच ही नही होता, वह आकाश सा विस्तृत है----"प्यार के लिए मेरी अम्मा मेरे बच्चे और मेरे अपने तुम सब हो, तो मुझे और क्या चाहिए?"
उनकी कही ये पंक्तियाँ अपनेपन को तो व्यक्त करती हैं साथ ही अपनों के लिए प्रेम भी दर्शाती हैं. और अम्मा से कुछ भी कहते हुए तो उनका बचपना और माँ से किया गया निवेदन भी परिलक्षित होता है और अम्मा उनका संबल बन जाती हैं----
बरसों बाद
जंग लगी किवाडों को
तुमने छुआ है !
मैं तो कैद थी
अपने दरो-दीवारों में,
तुमने बड़ी मुश्किल से उन्हें खोला है................
सर घुटनों में छुपाये
मैं तुम्हारी पदचाप सुन रही हूँ...........
आंखों का बाँध टूटा है,
दबे आंसू सिसकियों में सिमट गए हैं,
तुमने मेरे सर पे हाथ रखा है !
अब आई हो अपनी मुस्कान के पास ?
कहाँ थी अब तक?
मैं तो हँसना भूल गई,
रोना भी भूल गई,
बैठो मेरे पास
कुछ करो सपनों की बात.......
ये जो आंसू जब्त हैं,
अविरल बह तो जायें !
बहुत सहा मैंने,
सूरज के लिए भी
अपने द्वार नहीं खोले...
डर था,
जाने कब-वो भी कोई बेतुका सवाल रख जाए !
तुमको पता है ना ,
लोग दर्द को समझते नहीं,
पर उसका हिसाब-किताब रखते हैं !
पानी के छींटे तो नहीं डालते
तपते दिल पर,
पर गर्म शीशों की चुभन दे जाते हैं !
मैं भूल गई थी,
मैं मुस्कान हूँ......
चलो बरसों बाद ही सही,
तुमने मेरे अस्तित्व की याद दिला दी...
बढाओ हाथ,
करो वादा,
मेरे साथ रहोगी,
जो दर्द मेरी रगों में है,
उन्हें सुनोगी...तब तक-जब तक मुझे नींद न आ जाए,
नहीं जाओगी !
मुझे मेरी पहचान लौटाकर जाओगी !!!!!!!!!
अम्मा और बच्चे उनके जीवन का आधार हैं और वे मेरे लिए ईश्वर का वरदान हैं. आपसे उनका परिचय यह सोंचकर कराने का प्रयास किया की शायद आप में से किसी को भी उस वरदान की आवश्यकता हो. यह प्रयास मेरी भावनाओं पर आधारित है. और शायद ये प्रयास पूरा भी नही है. मेरे शब्दों में इतना साहस नहीं की मैं उन्हें जैसी वे हैं वैसा वर्णित कर पाऊँ. बस उनके लिए इतना ही कहना चाहूंगी----
विनम्रता और प्रेम में ,सिमटा हुआ विस्तार तुम
भावना और सोच कि गहराई का आधार तुम
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Sunday, December 21, 2008
Thursday, December 18, 2008
दीदी
गतांक से आगे.......
अपनेपन का बोध कराती दीदी की एक रचना के साथ फ़िर उनके विषय में कुछ कहने का प्रयास कर रही हूँ----
वक्त हो तो बैठो
दिल की बात करूँ....
कुछ नमी हो आंखों में
तो दिल की बात करूँ...
तुम क्या जानो,
अरसा बीता,
दिल की कोई बात नहीं की,
कहाँ से टूटा
कितना टूटा-
किसी को ना बतला पाई,
रिश्तों के संकुचित जाल में
दिल की धड़कनें गुम हो गईं !
पैसों की लम्बी रेस में
सारे चेहरे बदल गए हैं
दिल की कोई जगह नहीं है
एक बेमानी चीज है ये !
पर मैंने हार नहीं मानी है
दिल की खोज अब भी जारी है....
वक्त है गर तो बैठो पास
सुनो धड़कनें दिल की
इसमें धुन है बचपन की
जो थामता है -
रिश्तों का दामन फिर.............
वक्त हो तो बैठो,
दिल की कोई बात करूँ..........
अपनी बहुत सी कविताओं में से कुछ कविताओं में अपने जीवन का निचोड़ समेटे वह अपनी घनीभूत पीडाओं की तीव्रता से कहीं अधिक सहनशील हैं या यूँ कह लीजिये ---- पीडाओं की तीव्रता उनकी सहनशक्ति को और भी बढ़ा देती है. वे कहती हैं-"दर्द माँजता है, और हमें चमका देता है!"
संघर्ष उनके जीवन का सत्य है, तभी तो वो मुझे अपने दुःख से भी दुखी नही होने देतीं-"जो कुछ हुआ और जो हो रहा है, वह जीवन का सत्य है. उससे दुखी मत हो. मंथन करती रहो. अमृत को गृहण कर लो, विष को त्याग दो. ये जीवन स्वयं विसंगतियों से निकलने का मार्ग प्रशस्त करता है. जीवन के उतार-चढाव ही जीवन के हर रूप को समझाते हैं----
ये सच है,
मैं पैसे नहीं जमा कर पायी!
ये भी सच है,
मैं रिश्तों की पोटली नहीं बाँध सकी!
मेरी बेटी ने पूछा एक दिन-
"क्या मिला तुम्हे?"
मैंने सहज ढंग से कहा,
"वही-जो कर्ण को मिला...."
उसने पूछा - हार?
मैंने कहा -नहीं,
वही, जो पार्थ की जीत के बाद भी
कर्ण को ही मिला.......
तुम सब ख़ुद
नाम लेते हो कर्ण का
तो फिर प्रश्न कैसा?
"वह मुस्कुराई,
उसकी आंखों में
मुझे मेरी जीत नज़र आई।
दुनिया कहती है,
"जो जीता वही सिकंदर...."
पर सत्य था कुरुक्षेत्र!
जहाँ सारथी बने कृष्ण ने
कर्ण की पहुँच से
दूर भगाया अर्जुन को,
लिया सहारा छल का,
पर मनाने न दिया जीत का जश्न॥
सम्मान दिया उस तेज को..............
तो,यही जीत होती है!
जब भी मैं अपने अन्तर की पीड़ा उनसे बांटती, वे अपनी पीड़ा को भूल एक नई आसा के साथ मुझे जीवंत करती. उनके काव्य का आशावाद मेरी निराशा को पीछे ढकेल देता. इसके लिए शायद अलग से कोई उदहारण प्रस्तुत करने की आवश्यकता नही है. आप उनकी जितनी भी कविताएँ मेरे लेख के माध्यम से पढ़ रहे हैं, वे स्वयं उनके आशावाद का उदहारण हैं.
"मैं दुआ की तरह तुम्हारा साथ दूँगी तुम अपनी कलम पर और स्वयं पर विशवास रखो.तुम्हे जब भी मेरी ज़रूरत हो मुझे याद कर लेना, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ"----
अगर कभी मेरी ज़रूरत हो
मंदिर में एक दिया जला देना
दरगाह पे एक धागा बाँध देना
मैं कहीं भी रहूँ
तुम्हारी आवाज़ इस माध्यम से पहुँचेगी मेरे पास
यकीनन मेरी शुभकामनाएं
तुम्हें सुरक्षित करेंगी............
वे कहती हैं----"सपने देखो, उन्हें पूरा करने के लिए उन्हें बुनो, मेरे पास बहुत से सपने हैं, खयाली रूमानी और आसमानी। मुझसे सपने ले जाओ और बदले में इठलाती-खिलखिलाती एक निश्छल हँसी मुझे दे जाओ.
मेरे पास सपने हैं,
खरीदोगे?
आसमानी , रूमानी , ख्याली.....
कीमत तो है कुछ अधिक ,
पर कोई सपने बेमानी नहीं.......
जो भी लो-हकीकत बनेंगे,
शक की गुंजाइश नहीं!
.....कीमत है - एक मुस्कान,
सच्ची मुस्कान,
झरने-सी खिलखिलाती,
हवाओं - सी गुनगुनाती,
बादलों- सी इठलाती.......
आज की भागमभाग में
इसी की ज़रूरत है !
तुम एक सपना लो-
और मेरे पास एक मुस्कान दे जाओ,
.......
इनसे ही मेरे घर का चूल्हा जलता है!
क्रमशः...
नोट: कृपया दीदी की कविताओं से सजी इस रचना को अपना प्यार अवश्य दें.
अपनेपन का बोध कराती दीदी की एक रचना के साथ फ़िर उनके विषय में कुछ कहने का प्रयास कर रही हूँ----
वक्त हो तो बैठो
दिल की बात करूँ....
कुछ नमी हो आंखों में
तो दिल की बात करूँ...
तुम क्या जानो,
अरसा बीता,
दिल की कोई बात नहीं की,
कहाँ से टूटा
कितना टूटा-
किसी को ना बतला पाई,
रिश्तों के संकुचित जाल में
दिल की धड़कनें गुम हो गईं !
पैसों की लम्बी रेस में
सारे चेहरे बदल गए हैं
दिल की कोई जगह नहीं है
एक बेमानी चीज है ये !
पर मैंने हार नहीं मानी है
दिल की खोज अब भी जारी है....
वक्त है गर तो बैठो पास
सुनो धड़कनें दिल की
इसमें धुन है बचपन की
जो थामता है -
रिश्तों का दामन फिर.............
वक्त हो तो बैठो,
दिल की कोई बात करूँ..........
अपनी बहुत सी कविताओं में से कुछ कविताओं में अपने जीवन का निचोड़ समेटे वह अपनी घनीभूत पीडाओं की तीव्रता से कहीं अधिक सहनशील हैं या यूँ कह लीजिये ---- पीडाओं की तीव्रता उनकी सहनशक्ति को और भी बढ़ा देती है. वे कहती हैं-"दर्द माँजता है, और हमें चमका देता है!"
संघर्ष उनके जीवन का सत्य है, तभी तो वो मुझे अपने दुःख से भी दुखी नही होने देतीं-"जो कुछ हुआ और जो हो रहा है, वह जीवन का सत्य है. उससे दुखी मत हो. मंथन करती रहो. अमृत को गृहण कर लो, विष को त्याग दो. ये जीवन स्वयं विसंगतियों से निकलने का मार्ग प्रशस्त करता है. जीवन के उतार-चढाव ही जीवन के हर रूप को समझाते हैं----
ये सच है,
मैं पैसे नहीं जमा कर पायी!
ये भी सच है,
मैं रिश्तों की पोटली नहीं बाँध सकी!
मेरी बेटी ने पूछा एक दिन-
"क्या मिला तुम्हे?"
मैंने सहज ढंग से कहा,
"वही-जो कर्ण को मिला...."
उसने पूछा - हार?
मैंने कहा -नहीं,
वही, जो पार्थ की जीत के बाद भी
कर्ण को ही मिला.......
तुम सब ख़ुद
नाम लेते हो कर्ण का
तो फिर प्रश्न कैसा?
"वह मुस्कुराई,
उसकी आंखों में
मुझे मेरी जीत नज़र आई।
दुनिया कहती है,
"जो जीता वही सिकंदर...."
पर सत्य था कुरुक्षेत्र!
जहाँ सारथी बने कृष्ण ने
कर्ण की पहुँच से
दूर भगाया अर्जुन को,
लिया सहारा छल का,
पर मनाने न दिया जीत का जश्न॥
सम्मान दिया उस तेज को..............
तो,यही जीत होती है!
जब भी मैं अपने अन्तर की पीड़ा उनसे बांटती, वे अपनी पीड़ा को भूल एक नई आसा के साथ मुझे जीवंत करती. उनके काव्य का आशावाद मेरी निराशा को पीछे ढकेल देता. इसके लिए शायद अलग से कोई उदहारण प्रस्तुत करने की आवश्यकता नही है. आप उनकी जितनी भी कविताएँ मेरे लेख के माध्यम से पढ़ रहे हैं, वे स्वयं उनके आशावाद का उदहारण हैं.
"मैं दुआ की तरह तुम्हारा साथ दूँगी तुम अपनी कलम पर और स्वयं पर विशवास रखो.तुम्हे जब भी मेरी ज़रूरत हो मुझे याद कर लेना, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ"----
अगर कभी मेरी ज़रूरत हो
मंदिर में एक दिया जला देना
दरगाह पे एक धागा बाँध देना
मैं कहीं भी रहूँ
तुम्हारी आवाज़ इस माध्यम से पहुँचेगी मेरे पास
यकीनन मेरी शुभकामनाएं
तुम्हें सुरक्षित करेंगी............
वे कहती हैं----"सपने देखो, उन्हें पूरा करने के लिए उन्हें बुनो, मेरे पास बहुत से सपने हैं, खयाली रूमानी और आसमानी। मुझसे सपने ले जाओ और बदले में इठलाती-खिलखिलाती एक निश्छल हँसी मुझे दे जाओ.
मेरे पास सपने हैं,
खरीदोगे?
आसमानी , रूमानी , ख्याली.....
कीमत तो है कुछ अधिक ,
पर कोई सपने बेमानी नहीं.......
जो भी लो-हकीकत बनेंगे,
शक की गुंजाइश नहीं!
.....कीमत है - एक मुस्कान,
सच्ची मुस्कान,
झरने-सी खिलखिलाती,
हवाओं - सी गुनगुनाती,
बादलों- सी इठलाती.......
आज की भागमभाग में
इसी की ज़रूरत है !
तुम एक सपना लो-
और मेरे पास एक मुस्कान दे जाओ,
.......
इनसे ही मेरे घर का चूल्हा जलता है!
क्रमशः...
नोट: कृपया दीदी की कविताओं से सजी इस रचना को अपना प्यार अवश्य दें.
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