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Wednesday, December 10, 2008

मुझको क्यों थाम नही लेते?

हे मनभावन, हे अतिपावन!
प्रेम की तुम परिभाषा हो
मेरे जीवन का ज्योति-पुंज,
मेरी समग्र अभिलाषा हो.

है तुमसे ही प्रारंभ और
तुममे ही अंत समाया है
इस अन्तर का स्पंदन तुम,
श्वासें भी तेरी माया हैं

हो निर्निमेष, अनिमेष यदा
इक सृष्टि सृजित हो जाती है
कहते हैं तुमको परमात्मा
ये आत्मा ही बतलाती है

तुम प्रेम-गंध का एक बंध
मुझको क्यों बाँध नही लेते?
जीवन-जलनिधि में घिरी हुई,
मुझको क्यों थाम नही लेते?

तुम दिव्य प्रेममय एक पुरूष,
मैं विरह व्यथित एक नारी हूँ
हे अनंत प्रियवर सुंदर,
तुम पर मैं तन मन वारी हूँ

है अर्धोन्मीलित दृग बाट जोहते
कब ह्रदय द्वार खटकाओगे?
कर ब्रह्मनाद गुंजित सस्वर
"मै " को मुझमे ही समाओगे?

Friday, November 28, 2008

वह चुप थी

वह चुप थी,
उसकी आंखों में कुछ प्रश्न बोलते रहे.

उम्र सोलह अभी थी और
पिता समझा रहा था----
बेटी!
आपा जो रिश्ता लायी हैं,
लड़का परदेसी है.
उम्र में मुझसे ज़रा सा छोटा है
वो कहती हैं----
"तू खुश रहेगी,
तेरा भाई भी पढ़ लिख जाएगा,
तेरी बीमार माँ का खर्च भी वो उठाएगा.
थोड़ा घबरा रहा हूँ,
परदेस में तू कैसे रह पाएगी?
क्या तू उसके साथ निभा पायेगी?"

वह चुप थी.
उसकी आंखों में- - - - -

उसका मौन उसकी स्वीकृति मानी गई
ब्याह कर वो चली परदेस गई- - -
अभी गुज़रे थे चंद रोज़ कि,
एकदिन,
विवाह का शव लिए झुके कन्धों पे,
वह लौट आई.
आपा चिल्ला रही थीं---------
"इसने किसीको चैन से जीने न दिया,
तंग आकर ही शौहर ने इसे तलाक दिया!"
फ़िर भी--------

वह चुप थी
उसकी आंखों में- - - - -
वह आई थकी-थकी सी
चुप चाप वही बैठ गई.
पिता का क्रोध, खीझ और तिरस्कार झेलने के लिए--------
"तुझे मेरी मान मर्यादा, भाई कि शिक्षा,
माँ की बीमारी का ख्याल न आया?
तूने तो मुझे जीते जी दफनाया!"

वह चुप थी,
उसकी आंखों में- - - - -

बिना कुछ बोले, वह उठी,
मेहर की रकम पिता के हाथ पर रख दी.
फिर कांपते पैरों से सरकती,
भीतर चल दी.
उसकी टांगों के बीच फफक पड़ा उसका दर्द,
और पीछे खींचती गई
एक रक्त की लकीर!

वह चुप थी,
अब उसकी आंखों में कोई प्रश्न नही था.
प्रश्न अब झर रहे थे
पिता की आंखों से!

Monday, November 24, 2008

प्रेम डोर

तुम नैनों की राह चले
मन प्रागंण में कैसे पहुँचे?
पलकों के पहरेदार मेरे
क्या कर्तव्यों को भूल गए?

तुम आ ही गए कोई बात नही
था शांत भाव रखना तुमको
इस तुच्छ त्याज्य तन को छू कर
क्यों किया व्यथित तुमने मुझको?

है प्रेम पल्लवित पोषित तुमसे
जीवन का हो तुम स्पंदन
फिर क्यों घृणा उपजती मन में
चलता रहता ये मन-मंथन

हूँ क्षुब्ध आह! क्यों प्रेम किया
तुम जैसे नर-तन प्राणी से?
तुम तो वो प्रेम पिपासु नही
तुम प्यासे थे नारी तन के...

है एक यवनिका मध्य हमारे
खिंची हुई अंतस्थल में
जब तुम खींचोगे प्रेम डोर
वह स्वयं हटेगी उस पल में.

Friday, November 21, 2008

यूं तो...

यूं तो, तुम बहुत दूर हो मुझसे
पर कभी-कभी
तुम मेरे सबसे नज़दीक होते हो ...
जब मैं होती हूँ
बिलकुल अकेली
ऐसे में तुम्हारी यादें मुझे झकझोरती ,
कहती ----तुम तन्हा कहाँ हो ?
मैं हूँ तेरी सहेली

यूं तो तुम बहुत दूर हो मुझसे
पर कभी-कभी
मुझे लगता है ------
तुम मेरे सामने हो .......
लोंग कहते हैं ..........
मैं अब दिन में ख्वाब देखती हूँ
तुम ख्वाब नहीं ,हकीकत हो
ये अहसास मुझे जिंदा कर देता है ------------

यूं तो तुम बहुत दूर हो मुझसे
पर कभी-कभी
जब तुम्हारी गुदगुदाती यादें
मुझे हंसा देती हैं -----
और ये अहसास कि .......
तुम अब मेरे साथ नहीं
रुला देता है ..
लोंग कहते हैं कि मैं पागल हूँ
क्या तुम सचमुच बहुत दूर हो मुझसे ?

यूं तो तुम ...............................

Saturday, November 15, 2008

इंटरव्यू या ????

एक दफ्तर के सामने भीड़ थी,
बेरोज़गारों की-उम्मीदवारों की.

मेरे पास भी आया था
इंटरव्यू देने के लिए लैटर,
उस लैटर वाले लिफाफे में था एक और पेपर,
उसी पर लिखा था-
"दो लाख लाइए, नौकरी पाइये!"
दो लाख कहाँ से लाते?
हम तो चले आए थे किस्मत आज़माने.......
तभी--
चपरासी ने नाम लेकर पुकारा था,
घबराहट से चेहरा उतरा हमारा था.
अपने को संयत कर कमरे में पहुंचे,
सामने ही कुर्सी पर थे
एग्जामिनर महोदय बैठे.
आव देखा ना ताव
प्रश्नों की बौछार थी थोक भाव!
कद्दू में कितने बीज होते हैं?
तोते कितने घंटे सोते हैं?
मैंने कहा--
"सर जिनका इस नौकरी से कोई सम्बन्ध नही,
वो भी कोई क्वेश्चन हैं?!"
वो बोले--
"हाँ! यही तो क्वेश्चन हैं.
क्योंकि मंत्री जी के भतीजे का सेलेक्शन है!"
मैं झल्लाई! "तो दो लाख क्यों मांगे थे?"
वो थोड़ा मुस्कुराये,
अपना मुंह मेरी तरफ़ उठाए
धीरे से बोले,
"तो क्या आप लाई हैं?
मैंने तो कबसे झोली फैलाई है!"
फ़िर समझाने के अंदाज़ में बोले--
"देखिये,आज कल झूठ का ज़माना है,
मंत्री जी और उनका भतीजा तो एक बहाना है!"

Tuesday, November 11, 2008

आते व्याकुल करने क्यों वो......

है ह्रदय मेरा विस्तृत हृद सा
बना एक स्मृति का नगर
आते व्याकुल करने क्यों 'वो'
मुझको निशि के ही प्रथम प्रहर

उनकी स्मृति मधु-सी पीड़ा
ज्यों कर्ण निकट बजती वीणा
मधुमय ध्वनि विरहा राग लिए
तड़पे विरहन जिसको सुनकर

स्वप्नों में आए तो कुछ क्षण
दर्शन अतृप्त रहगये नयन
लेती पखार पग अश्रु-नीर
कुछ क्षण जो जाते और ठहर

करना चाहूं जब ही विस्मृत
उनके ओष्ठों की मृदु स्मित
स्मृतियों की सेना लेकर
करती विस्मृति से घोर समर

आते व्याकुल करने क्यों वो.......

मैं उड़ जाऊंगी!

कभी सोचती हूँ,
मैं उड़ जाऊं
ऊपर,
बहुत ऊपर
उस नीले आकाश में
अपने पंखों को फैला कर,
परिंदों के मानिंद.
फ़िर थककर बैठ जाऊं
पेड़ों की
हरी भरी डालों पर,
सोचती हूँ
क्या कभी ऐसा होगा?
हाँ! शायद कुछ ऐसा ही होगा.
मैं उड़ जाऊंगी
बहुत ऊपर,
नीले आकाश से भी,
और ज़िन्दगी के बोझ से
बोझिल शरीर
होगा पेड़ों की डालों पर
फर्क बस इतना होगा...
वह होंगी सूखी और जलने में समर्थ!

साथ तन्हाई के शामें मेरी गुज़रती हैं..........

मेरे हंसने का सबब ना पूछो लोगों
सिसकियाँ यूं ही मेरी निकलती हैं ,

दिल को ज़ख्मों से भर दिया तुमने
फिर भी यादें उसी में पलती हैं ,

हांथों में हाथ लिए हम चले जिन राहों पर
सर्द आहें वहां ठंडी हवा सी चलती हैं ,

किताब-ए-ज़िन्दगी में तू जहां तक शामिल था
मेरी उंगलियाँ पन्ने वही पलटती हैं ,

सर्द सहरों की नम शबनम-सी यादें
रह-रह के आज भी सुलगती हैं ,

उम्र तन्हा कटेगी कैसे ,नहीं सोचा है
साथ तन्हाई के शामें मेरी गुज़रती हैं ............

Monday, November 10, 2008

माँ का आँचल

बाल चंद्र ने कहा
निशा माँ मुझे उठा लो,
चमकते-दमकते

सितारों से जड़े
अपने आँचल में
चन्द्रिका करों का लेकर आश्रय
चाँद बढ़ने लगा--
डगमगा कर,
फ़िर-फ़िर संभलने लगा
मानो उसे आवश्यकता हो
अपने सहज और संपूर्ण
विकास के लिए,
माँ के आँचल की

शीतल छाँव की!

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