Monday, November 10, 2008

माँ का आँचल

बाल चंद्र ने कहा
निशा माँ मुझे उठा लो,
चमकते-दमकते

सितारों से जड़े
अपने आँचल में
चन्द्रिका करों का लेकर आश्रय
चाँद बढ़ने लगा--
डगमगा कर,
फ़िर-फ़िर संभलने लगा
मानो उसे आवश्यकता हो
अपने सहज और संपूर्ण
विकास के लिए,
माँ के आँचल की

शीतल छाँव की!

7 comments:

Shashank Pandey's Blog said...

KYA KHOOB LIKHA HAI MA'AM

संजीव तिवारी said...

प्रकृति में अवलंबित सुन्‍दर भावों को समेटा है आपने, चंद्रमा, रात्रि,चांदनियों के साथ मातृत्‍व का ऐसा रंग बिखेरा है कि हृदय से निकल रहा है वाह .........

संजीव तिवारी said...

प्रकृति में अवलंबित सुन्‍दर भावों को समेटा है आपने, चंद्रमा, रात्रि,चांदनियों के साथ मातृत्‍व का ऐसा रंग बिखेरा है कि हृदय से निकल रहा है वाह .........

संजीव तिवारी said...

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INDIA ON PHONE said...

apni bhabnaon ko sateek tarah se chitrit kiya gaya hai. hamari shubhkamna.

INDIA ON PHONE said...

shabd srijan ka chitran bada sateek laga. apni kriti niyamit roop se bhejte rahen. meri ichchha hai ki yah print men bhi aaye.......GOPAL PRASAD.(09230605248,09231640685)E-MAIL:gopalprasad6@gmail.com

ND Pandey's Blog said...

sahaj swabhawik abhivyakti

bachpan ko yad dilati

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