Sunday, December 21, 2008

दीदी

गतांक की याद दिलाने के लिए पुनः कुछ पंक्तियाँ दीदी की उसी रचना से......


आज की भागमभाग में
इसी की ज़रूरत है !

तुम एक सपना लो-और मेरे पास एक मुस्कान दे जाओ,
.......इनसे ही मेरे घर का चूल्हा जलता है!


जब भी मैं इन कविताओं को पढ़ती हूँ, वे मेरा हौंसला बढाती हैं मैं फिर नई आशा से भर जाती हूँ. दीदी का स्नेह और आशीष पाने के लिए, मैं उनसे प्रायः प्रतिदिन ही बतें करती हूँ.कौन जाने कब उनके आशावाद की कुछ छींटे मुझ पर गिर जायें और मैं निराशा से दूर एक सहज, सरल, एवं निश्छल हँसी देकर उनकी पोटली से एक सपना चुरा लूँ. मुझे वो अपना सपना भी देने को कहती हैं और हँसी भी. एक निस्वार्थ भावना और ढेर सारा अपनापन, यही तो उन्हें औरों से अलग कर देता है. जब भी मैं उनसे बातें करती हूँ, वे अपनेपन के साथ मुझे अपनी कविता के माध्यम से उत्तर देती हैं----


तुमने मुझे 'अच्छी' कहा
तो घटाएं मेरे पास आकर बैठ गयीं,
मेरी सिसकियों को अपने जेहन में भर लिया.....
सारी रात घटाएं रोती रहीं,
लोग कहते हैं -' अच्छी बारिश हुई '


पीड़ा से भीगा उनका मन प्यार को पूजा समझता है. वे कहती हैं प्यार स्त्री और पुरूष के बीच ही नही होता, वह आकाश सा विस्तृत है----"प्यार के लिए मेरी अम्मा मेरे बच्चे और मेरे अपने तुम सब हो, तो मुझे और क्या चाहिए?"
उनकी कही ये पंक्तियाँ अपनेपन को तो व्यक्त करती हैं साथ ही अपनों के लिए प्रेम भी दर्शाती हैं. और अम्मा से कुछ भी कहते हुए तो उनका बचपना और माँ से किया गया निवेदन भी परिलक्षित होता है और अम्मा उनका संबल बन जाती हैं----


बरसों बाद
जंग लगी किवाडों को
तुमने छुआ है !
मैं तो कैद थी
अपने दरो-दीवारों में,
तुमने बड़ी मुश्किल से उन्हें खोला है................
सर घुटनों में छुपाये
मैं तुम्हारी पदचाप सुन रही हूँ...........
आंखों का बाँध टूटा है,
दबे आंसू सिसकियों में सिमट गए हैं,
तुमने मेरे सर पे हाथ रखा है !
अब आई हो अपनी मुस्कान के पास ?
कहाँ थी अब तक?
मैं तो हँसना भूल गई,
रोना भी भूल गई,
बैठो मेरे पास
कुछ करो सपनों की बात.......
ये जो आंसू जब्त हैं,
अविरल बह तो जायें !
बहुत सहा मैंने,
सूरज के लिए भी
अपने द्वार नहीं खोले...
डर था,
जाने कब-वो भी कोई बेतुका सवाल रख जाए !
तुमको पता है ना ,
लोग दर्द को समझते नहीं,
पर उसका हिसाब-किताब रखते हैं !
पानी के छींटे तो नहीं डालते
तपते दिल पर,
पर गर्म शीशों की चुभन दे जाते हैं !
मैं भूल गई थी,
मैं मुस्कान हूँ......
चलो बरसों बाद ही सही,
तुमने मेरे अस्तित्व की याद दिला दी...
बढाओ हाथ,
करो वादा,
मेरे साथ रहोगी,
जो दर्द मेरी रगों में है,
उन्हें सुनोगी...तब तक-जब तक मुझे नींद न आ जाए,
नहीं जाओगी !
मुझे मेरी पहचान लौटाकर जाओगी !!!!!!!!!


अम्मा और बच्चे उनके जीवन का आधार हैं और वे मेरे लिए ईश्वर का वरदान हैं. आपसे उनका परिचय यह सोंचकर कराने का प्रयास किया की शायद आप में से किसी को भी उस वरदान की आवश्यकता हो. यह प्रयास मेरी भावनाओं पर आधारित है. और शायद ये प्रयास पूरा भी नही है. मेरे शब्दों में इतना साहस नहीं की मैं उन्हें जैसी वे हैं वैसा वर्णित कर पाऊँ. बस उनके लिए इतना ही कहना चाहूंगी----


विनम्रता और प्रेम में ,सिमटा हुआ विस्तार तुम
भावना और सोच कि गहराई का आधार तुम

12 comments:

varun jaiswal said...

ज्योत्सना जी भावनाओं को अश्कों से पल्लवित करना आपकी लेखनी की सर्वोत्तम विशेषता है |
हम इसके कायल हैं | मेरी नई पोस्ट पर जरुर आयें स्वागत है |

रश्मि प्रभा said...

मैं विस्मयविमुग्ध तुम्हारी कलम की स्याही में समाहित हूँ
या मन की गहराइयों में
या मस्तिष्क के किसी कोने में
....जहाँ भी रहूँ,लगा - एक गीत हूँ,
एक चित्र,एक कण,एक लहर,एक भीगा पल,
पतवार,पाल,..........बहुत कुछ ,
जो तुमने बुना है!
मैं तो वही हूँ-जो थी
वहीँ हूँ-जहाँ थी
एक एहसास,एक रिश्ता,और प्यार!

hem pandey said...

'सूरज के लिए भी अपने द्वार नहीं खोले
* * * * * * * *
जब तक मुझे नींद नहीं आ जाए
नहीं जाओगी,
मुझे अपनी पहचान लौटा कर जाओगी !!!!!!!!!'

- वाह!

वेद प्रकाश सिंह said...

'एक ख्वाब मेरे पास भी है,जो कितनी ही मुस्कानों से बेशकीमती है..और मेरा अनमोल ख्वाब ये है की मै माँ की कविता-लेखन की अदभूत क्षमता को दुनिया के सामने लाना चाहता हूँ और उन्हें वो मुकाम दिलाना चाहता हूँ जिनकी वो वास्तविक रूप से हकदार है.....माँ के लिए आपका प्रयास सराहनीय है, बस आप युं ही अग्रसर रहे और इस सफ़र मे माँ का हाथ थामे रहे...और क्या कहूँ '

डॉ .अनुराग said...

भावपूर्ण ओर संवेदना से भरा संस्मरण !

डुबेजी said...

jyotsna ji sadar namaskar aap ke blog par ana hua aur apki rachna pad kar acha laga bahut hi sundar panktiya likhi hain BADHAI

विकास कुमार said...

बस नमन करता हूँ आपकी लेखनी को.

प्रदीप मानोरिया said...

ज्योत्सना जी नमस्कार
आप अपनी कलम में रोशनाई भारती हैं या की फ़िर भावनाएं
आपकी कलम आपके अंतर्मन के भावो को ऐसे अभिव्यक्त करती है मानो कोई केमेरा चित्र खींच रहा है अथवा कोई चित्रकार भावों को रंगों से चित्रित कर रहा है

आश्चर्य सहित हार्दिक बधाई

Jyotsna Pandey said...

didi ki rachanaaon ke liye aap sabhi ne jo pyar diya usake liye ---aap sabhi ka hardik aabhar

ρяєєтι said...
This comment has been removed by the author.
ρяєєтι said...

i am निशब्द .... कुछ गुंजाईश ही नहीं रखी आपने शब्दों की ...

विनम्रता और प्रेम में ,सिमटा हुआ विस्तार तुम
भावना और सोच कि गहराई का आधार तुम ...
यह ज्योत्स्ना जी कहती है ,उसे आगे बढा कर ..


मेरी रचना की सोच और विचार तुम..
बन गई मेरे प्रेममई जीवन का आधार तुम .....
यह प्रीती कहती है .

VaRtIkA said...

di ...kya kahoon iss par samajh nahin aa raha... aankhein nam hain aur shabd kahin gum... bas aapko naman karti hoon...

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