Friday, February 27, 2009

दस्तक

जब भी कोई दस्तक होती है
मैं दौड़ जाती हूँ
कहीं तुम तो नहीं
जाने क्यों?

तुम्हारा ही इंतज़ार रहता है,
इन आँखों को
अब तो आदत सी
हो गयी मुझको
हर वक़्त एक दस्तक सुनायी देती है

तुम्हारे आने की आहट
खुशबू सी फैलाती
मेरे मन मैं सिमट जाती है
" तुम मेरे भीतर हो "
मुझमें समाहित...

तो क्यों मैं दूर हूँ तुमसे
और फिर ये दस्तक कैसी?
शायद तुम दस्तक देकर
मेरे " मैं " को बाहर निकलना चाहते हो
ताकि हम हो सकें एक ...

22 comments:

रंजना said...

waah ! waah ! waah !

atisundar bhaav aur manohari abhivyakti....bahut hi sundar..

प्रदीप मानोरिया said...

ह्रदय को छु जाने वाले भावों को समेटे आपकी कलम का अनुपम करतब सच में अन्तरंग गहराइयों को व्यक्त करती कविता

ND Pandey's Blog said...

is dastak ko mehsoos karne ki baat hai. Har insaan nahi kar sakta hai...

wah!!! ati sundar!!!

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

आपकी इस कविता को पढ़ते हुए महादेवी वर्मा की कुछ पंक्तियाँ याद हो आईं -

तुम मुझमें प्रिय ! फिर परिचय क्या !
तेरा मुख सहास अरुणोदय,
परछाईं रजनी विषादमय,
यह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
खेल-खेल थक-थक सोने दो
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या !

Shikha Deepak said...

बहुत ही सुंदर भावाव्यक्ति।

भाई गुडिया said...

बहुत ही सुंदर भाव. अच्छी प्रस्तुति.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुंदर भाव

Shashank Pandey's Blog said...

वाह!
इस दस्तक के बारे में क्या कहूं?
एक आध्यात्मिक दस्तक है...

डॉ .अनुराग said...

निसंदेह.....खूब कहा .एक गाना याद आया .जरा सी आहट होती है

ρяєєтι said...

प्यार भरी दस्तक की खुशबू इतनी पवित्र होती है , जो मन् को छु कर एक् अप्रतिम एहसास महसूस करवाती है .

बहोत अद्वितीय है यह " दस्तक " दोस्त जी ... Luvssss.

Dileepraaj Nagpal said...

khushboo yhan jaipur tak aa gyi. badhayi.

awesh said...

ज्योत्स्ना जी ,आपकी ये कविता मुझे परेशान कर रही है ,ये कैसे संभव है की आप उसके पीछे दौडें ,और फिर भी अहम् ख़त्म न हो रहा हो ?हाँ ये दस्तक , उसको न पकड़ पाने की कुंठा और साथ ही पैदा हो रहा अनुनाद निश्चित तौर पर महान परिस्थितियां पैदा कर रहा है |हम आज कह सकते हैं कि आपकी कविता सिर्फ शब्दों का मकद जाल नहीं है बल्कि व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का चरम है ,जैसी आप हैं वैसी आपकी कविता | स्वीकार करें मेरा अभिवादन इन तीन पंक्तियों के साथ |

ज़मीं भी उसकी,ज़मी की नेमतें उसकी
ये सब उसी का है,घर भी,ये घर के बंदे भी



खुदा से कहिये,कभी वो भी अपने घर आयें!

सीमा रानी said...

ज्योत्सना जी ,सुन्दर रचना के लिए बधाई. और दिल की महफ़िल में आने के लिए धन्यवाद .

masoomshayer said...

शायद तुम दस्तक देकर
मेरे " मैं " को बाहर निकलना चाहते हो
ताकि हम हो सकें एक ...

bahut hee sashakt bhaav

masoomshayer said...

शायद तुम दस्तक देकर
मेरे " मैं " को बाहर निकलना चाहते हो
ताकि हम हो सकें एक ...

bahut hee sashakt bhaav

vinay sheel said...

bahut achhi kavita hai...... dil se badhai

रश्मि प्रभा said...

मैंने दस्तक दी,
और प्यारे एहसास मेरे आस-पास इकठ्ठे हो गए,
प्यार की सम्मोहक दस्तक है रचना में,बधाई और शुभकामनायें.......

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" said...

ज्योत्सना जी
बड़ी भावनात्मक कविता है >>
"शायद तुम दस्तक देकर, मेरे " मैं " को बाहर निकलना चाहते हो"
यथार्थ परक है....
-विजय तिवारी ' किसलय '

KANISHKA KASHYAP said...

this is how one can express sophisticated of thoughts in the simplest words possible. That was stupendous. I too wish to start publishing my own NAZM etc. Wish to get your supervision...

નીતા કોટેચા said...

मुजमे मै समाया हुवा हु ,
पर खुद को ही कभी मिलता नहीं मै..
यादो की दस्तक और इंतजार की दस्तक ,
उसी में मै ढूंढ़ता हु खुद को ...

नीता कोटेचा

yati said...

ek achchhi kavita ke liye sadhuwad.
omprakash yati

बृजेन्‍द्र कुमार गुप्‍ता said...

ज्योत्सना जी ,सुन्दर रचना के लिए बधाई.

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